बूढ़ा बाघ और लालची मुसाफिर, हितोपदेश,पंचतंत्र
बूढ़ा बाघ और लालची मुसाफिर
जंगल का शांत माहौल। तालाब के किनारे एक बूढ़ा, कमज़ोर बाघ बैठा है। उसके हाथ में एक सोने का कंगन चमक रहा है।
एक समय की बात है, जंगल के तालाब किनारे एक बूढ़ा बाघ बैठा था। ढलती उम्र के कारण वह शिकार करने में कमज़ोर हो चुका था, इसलिए उसने पेट भरने के लिए एक चाल सोची।
एक मुसाफिर राह से गुज़रता है। बाघ मीठी मुस्कान के साथ कंगन दिखाता है।
बाघ (धीमी और छलभरी आवाज़ में): हे राही! रुको... मेरे पास यह सोने का कंगन है। अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और धर्म-कर्म का मार्ग अपना चुका हूँ। आओ, यह कंगन तुम ले लो।
मुसाफिर के चेहरे पर लालच दिखाई देता है। वह बिना सोचे-समझे कंगन लेने के लिए तालाब की ओर बढ़ता है।
मुसाफिर (मन ही मन सोचते हुए): मुफ्त में सोने का कंगन! ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता।
लालच में अंधा होकर मुसाफिर कंगन लेने तालाब में उतर गया।
मुसाफिर तालाब के गहरे कीचड़ में धँस जाता है। बाघ तुरंत झपट्टा मारता है।
मुसाफिर (घबराकर): अरे! मैं तो कीचड़ में फँस गया... बचाओ!
मुसाफिर को लाचार देखते ही बूढ़े बाघ ने उस पर हमला कर दिया और उसे मारकर खा गया।

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