व्रत, परंपरा और पितृसत्ता: उपवास की धुरी हमेशा महिलाएँ ही क्यों?
व्रत केवल महिलाओं की जिम्मेदारी हैं? जानिए धर्मग्रंथों, समाजशास्त्रीय शोध और स्वास्थ्य आंकड़ों के नजरिए से भारतीय उपवास परंपरा का यथार्थ।
हरतालिका तीज, करवा चौथ, अहोई अष्टमी, जितिया या छठ—भारतीय पंचांग में व्रतों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। इन सभी आयोजनों में एक बात पूरी तरह समान दिखती है: निर्जला या फलाहार रहकर पूरे दिन कठिन अनुष्ठान में जुटी घर की महिलाएँ।
ऐसे में यह तार्किक सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब अध्यात्म, ईश्वर और आस्था सबके लिए समान हैं, तो भूख, प्यास और त्याग की यह कठिन कसौटी मुख्य रूप से स्त्रियों के हिस्से ही क्यों आई?
इस सामाजिक चलन को समझने के लिए हमें धर्मग्रंथों, समाजशास्त्रीय अध्ययनों और स्वास्थ्य संबंधी यथार्थ को एक साथ देखना होगा।
1. शास्त्रों का सच: व्रत आत्मशुद्धि के लिए था, जेंडर के लिए नहीं
वैदिक और पौराणिक साहित्य के अनुसार, उपवास का मूल अर्थ 'उप + वास' यानी ईश्वर के निकट बैठना और इंद्रिय-निग्रह (आत्म-संयम) है।
धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु: इन प्रामाणिक स्मृतियों और धर्मग्रंथों में एकादशी, प्रदोष, महाशिवरात्रि या चातुर्मास जैसे व्रतों के नियम सभी मनुष्यों के लिए समान बताए गए हैं। इनमें कहीं भी उपवास को केवल स्त्रियों तक सीमित नहीं किया गया।
श्रीमद्भगवद्गीता: गीता के छठे अध्याय में आहार और तप के संतुलन की बात कही गई है, जहाँ उपवास को व्यक्तिगत आत्म-विकास का माध्यम माना गया है।
कथाओं का मध्यकालीन रूपांतरण: मध्यकाल में 'व्रत कथाओं' का चलन तेज़ी से बढ़ा। इन कथाओं में व्रतों को सीधे पति की लंबी उम्र, पुत्र प्राप्ति या परिवार की सुरक्षा के अलौकिक फल से जोड़ दिया गया।
2. समाजशास्त्रीय नजरिया: 'पतिव्रता धर्म' का संस्थागत रूप
प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास के 'संस्कृतिकरण' (Sanskritisation) और लीला दुबे के 'जेंडर और समाजीकरण' से जुड़े अध्ययन बताते हैं कि पारंपरिक भारतीय समाज में महिला की पहचान उसके रिश्तों (पत्नी और माँ) के इर्द-गिर्द तय की गई।
त्याग का महिमामंडन: समाज ने 'पतिव्रता' और 'त्यागमयी माँ' के रूप को सर्वोच्च सामाजिक सम्मान दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि महिला के व्यक्तिगत सुख और स्वास्थ्य से ऊपर परिवार के मंगल को अनिवार्य बना दिया गया।
काल्पनिक भय और अपराधबोध (Guilt): अधिकांश पारंपरिक व्रतों के साथ यह डर जोड़ दिया गया कि यदि अनुष्ठान में कोई कमी रही या व्रत टूटा, तो परिवार पर विपत्ति आ सकती है। इस मनोवैज्ञानिक दबाव ने महिलाओं को अस्वस्थ होने पर भी उपवास जारी रखने के लिए विवश किया।
3. मानवविज्ञानी शोध: एजेंसी और सामाजिक जुड़ाव
मानवविज्ञानी सुसान वाड्सले (Susan Wadley) के उत्तर भारतीय समाज पर किए गए शोध एक दूसरा पहलू भी उजागर करते हैं। पारंपरिक दौर में व्रत केवल धार्मिक बंधन नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए कुछ हद तक 'एजेंसी' (मानसिक नियंत्रण) और आपसी जुड़ाव का साधन भी थे।
चारदीवारी में रहने वाली महिलाओं के लिए व्रत, तीज और त्योहार अपनी सहेलियों से मिलने, सजने-संवरने, गीत गाने और अपने सुख-दुख साझा करने का एक स्वीकृत सामाजिक मंच बनते थे।
4. स्वास्थ्य और पोषण: क्या आंकड़े परंपरा से मेल खाते हैं?
कठिन, निर्जला और लगातार उपवासों का सीधा प्रभाव महिलाओं के पोषण और स्वास्थ्य पर पड़ता है:
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5): भारत में 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 57% से अधिक महिलाएँ एनीमिया (खून की कमी) से जूझ रही हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित पोषण की कमी और बार-बार निर्जला उपवास मेटाबॉलिज्म, रक्तचाप और हीमोग्लोबिन स्तर पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। आस्था के नाम पर शारीरिक सीमाओं की अनदेखी करना लंबे समय में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देता है।
बदलती सोच: औपचारिकता से वास्तविक बराबरी की ओर
आज के दौर में जब महिलाएँ घर और कार्यक्षेत्र दोनों में बराबर का योगदान दे रही हैं, इस परंपरा का चेहरा भी बदल रहा है। अब कई युवा पुरुष भी अपनी जीवनसंगिनी के साथ बराबरी से उपवास रखने लगे हैं, जिससे यह रिवाज एकतरफा मजबूरी के बजाय आपसी सम्मान और प्रेम का प्रतीक बन रहा है। वहीं, कई महिलाएँ अंधानुकरण के बजाय अपने स्वास्थ्य और तार्किकता को प्राथमिकता दे रही हैं।
आस्था मन के समर्पण और पवित्रता में है, किसी एक जेंडर के भूखे रहने की अनिवार्यता में नहीं।
आपकी राय:
क्या आपको लगता है कि पारिवारिक व्रतों को अब दोनों साझेदारों द्वारा मिलकर निभाया जाना चाहिए, या फिर आस्था को केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित रखना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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